मुखौटे से इतनी बेरुख़ी क्यूँ ?

मुखौटे का नज़रिया इतना जर्जर क्यूँ ?

एक मुखौटा ही तो है,

जो बिन बोझ लिए चल रहा हर एक शख़्स है!

फिर मुखौटे से इतनी बेरुख़ी क्यूँ?


मगरूर है बख़ूबी से इस खेल में !

शख़्स किरदारों को निभाने में !

थोड़ी तारीफ़ों के बोझ तले दबने में !

तो थोड़ा मशहूर है कई चेहरों से मुखौटा हटाने में!


ज़हर का प्याला पी कर कोई अमृत का मंथन करे !

तो कोई शराफ़त का खेल दिखा कर बेक़सूरों से छल करे !

मुखौटे के दांव पेच अपनी सहूलियत का हिसाब रखता है!

इंसानी फ़ितरत इसको भरपूर आज़मा लेता है!


 फिर क्यूँ मुखौटे से इतनी बेरुख़ी क्यूँ ?....!


Mukhota Written by Priya Pandey Hindi Poem, Poetry, Quotes, कविता, Written by Priya Pandey Author and Hindi Content Writer. हिंदी कहानियां, हिंदी कविताएं, विचार, लेख.

Mukhote Se Itni Berukhi Kyu ? 

Mukhote Ka Nazariya Itna Jarjar Kyu ?

Ek Mukhota Hi To Hai,

Jo Bin Bojh Lie Chal Raha Har Ek Shakhs Hai !

Phir Mukhote Se Itni Berukhi Kyu? 


Magaroor Hai Bakhubi Se Is Khel Mein!

Shakhs Kiradaro Ko Nibhane Mein !

Thodi Tareefo Ke Bojh Tale Dabane Mein !

To Thoda Mashoor Hai,

Kai Cheharo Se Mukhauta Hataane Mein ! 


Zahar Ka Pyala Pee Kar Koi Amrat Ka Manthan Kre ! 

To Koi Sharafat Ka Khel Dikha Kar Beqasuro Se Chal Kre ! 

Mukhote Ke Dav Pech Apni Sahuliyat Ka Hisaab Rakhta Hai ! 

Insani Fitarat Isko Bharpoor Aazma Leta Hai !

Phir Kyu Mukhote Se Itni Berukhi Kyu ?....!